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December 31, 2013

Love the taste of Jharkhand




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November 20, 2012




June 25, 2012

यादें याद आतीं हैं

साल 2001 कई मायनों  में  एक मील  का  पत्थर  साबित हुआ . एक  ओर जहाँ  ओसामा  बिन  लादेन की मौत   अमेरिका  के  लिए खुशियाँ  लेकर   आया वहीं दूसरी ओर सुनामी की लहरों ने ने  पुरे जापान को तवाह कर दिया , अरब देशों में तानाशाह के खिलाफ जो गृह युद्ध हुये वो शायद  शताब्दी का सबसे ज्वलन्त मुद्दा था , तो आइये आप और हम  मिल कर उन्ही कुछ खट्ठी-मीठी यादों को ताज़ा करतें  हैं.....   



 बर्फ़बारी 



जापान  में सुनामी से  चंद मिनट पहले और चंद मिनट  बाद की तस्वीर 




वाल स्ट्रीट,  अमेरिका ( मंदी की  मार ) 
 बहिस्कार करने का अनोखा तरीका (USA )
 कुदरत  का कहर और अपनों को खोने का गम 
 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (USA )
 शायद हीं कोई चेहरा हो जो मुस्कुराता हुआ अच्छा ना लगे (जापान )
 जीत का जश्न (UK )
 जापान की विनाशक सुनामी 
 जापान - अकेली रोती  औरत (कुदरत का  कहर )
 US ARMY के शहीद होने के बाद उनका कुत्ता शोक मनाता हुआ 
 शांतिपुर्बक  बहिस्कार करने वालों पे काली मीर्च का स्प्रे करता  जवान 
 इराक -छात्र को  मुक्का मारता US ARMY 
 USA -ओसामा के  मरने की ख़ुशी 
 WHIRLPOOL -जापान 
 जापान  में सुनामी  के बाद  पानी में फासी बेटी को संताबना देता पिता 
 जापान- सेटेलाइट से सुनामी का लिया गया तस्वीर  
 भूकंप का खौफ - थाईलैंड 
 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में मारे गये लोगों की आखरी याद 
 जापान-शायद शब्द  कम पड़ जाये (तबाही का अनुमान खुद लगा लीजिये) 
 USA -आग मे  फसे लोगों को निकलता कर्मचारी कर्मचारी 
 जापान-बेटे को समझाती माँ (सबकुछ खोने का गम )
  लिबिया - गदाफ्फी के खिलाफ AK- 47 चलाती महिला 
 USA - आग के साद  से बिल्डिंग से कुदती महिला 
 जापान - सुनामी 
 इराक फतह कर आती आती US ARMY 
 USA - ओसामा के मौत का COVERAGE देखते ओबामा  
 जापान-सुनामी 
 इराक-US ARMY से हाथ मिलाता बच्चा 
 जापान-तबाही का आलम 
जापान- कुछ  ना  बचा 
 जापान-तभी तबाही के बाद कुत्ते से खेलती महिला 
  चीन - I PHONE के जनक जनक स्टीव जोब्स जोब्स के कलाकृति को APPLE STORE के  बाहर देखता    बच्चा 
बहिष्कार @UK 

सुडान - "चलना हीं जिंदगी है चलती हीं जा रही है "




सूडान, आधिकारिक तौर पर सूडान गणराज्य, उत्तरी पूर्व अफ्रीका में स्थित एक देश है। यह अफ्रीका और अरब जगत का सबसे बड़ा देश है, इसके अलावा क्षेत्रफल के लिहाज से दुनिया का दसवां सबसे बड़ा देश है। इसके उत्तर में मिस्र, उत्तर पूर्व में लाल सागर, पूर्व में इरिट्रिया और इथियोपिया, दक्षिणपूर्व में युगांडा और केन्या, दक्षिण पश्चिम में कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य और मध्य अफ़्रीकी गणराज्य, पश्चिम में चाड और पश्चिमोत्तर में लीबिया स्थित है। दुनिया की सबसे लंबी नदी नील नदी, देश को पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में विभाजित करती है। इसकी राजधानी खार्तूम है। सूडान दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जहां आज भी 3000 ईपू बसी बस्तियां अपना वजूद बचाए हुए हैं। यूनाइटेड किंगडम से 1956 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद सूडान को 17 साल तक चले लंबे गृह युद्ध का सामना करना पड़ा, जिसके बाद अरबी और न्यूबियन मूल की बहुतायत वाले उत्तरी सूडान और ईसाई और एनिमिस्ट निलोट्स बहुल वाले दक्षिणी सूडान के बीच जातीय, धार्मिक और आर्थिक युद्ध छिड़ गया, जिसकी वजह से 1983 में दूसरा गृहयुद्ध शुरू हुआ। इन लड़ाइयों के बीच कर्नल उमर अल बाशिर ने 1989 में रक्तविहिन तख्तापटल कर सत्ता हथिया ली। सूडान ने व्यापक आर्थिक सुधारों को लागू कर वृहदतर आर्थिक विकास दर हासिल की और 2005 में एक नया संविधान के माध्यम से दक्षिण के विद्रोही गुटों को सीमित स्वायत्तता प्रदान करने और 2011 में स्वतंत्रता के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने की बात सहमति बनने के बाद गृहयुद्ध समाप्त किया। प्राकृतिक संसाधन के रूप में पेट्रोलियम और कच्चे तेल से भरे-पूरे सूडान की अर्थव्यवस्था वर्तमान में विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। जनवादी गणराज्य चीन और रूस सूडान के सबसे बड़े व्यापार भागीदार हैं।



राजधानी -                                     खार्तूम
सबसे बडा़ नगर-                            ओमदुरमन
राजभाषा-                                      अरबी और अंग्रेजी
सरकार-                                         संघीय अध्यक्षीय लोकतांत्रिक गणराज्य
 राष्ट्रपति-                                      उमर अल-बशर
 उप-राष्ट्रपति-                                साल्वा किर मायारदीत
 संवैधानिक सलाहकार-                   मिन्नी मिन्नावी


गठन  
 - नूबिया का साम्राज्य                      2000 BC 
 - सेनार राजशाही                             1504 
 - मिस्र के साथ एकीकरण                 1821 
 - युनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता 1 जनवरी 1956 
 - वर्तमान संविधान                         9 जनवरी 2005  


क्षेत्रफल
 - कुल-                                             2,505,813 किमी² (10 वां)
 - जल(%)-                                       6 %


जनसंख्या
 - 2009 अनुमान  -                           42,272,000 (33 वां)
 - जन घनत्व -                                   16.9/किमी² 


सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)              {२००८ अनुमान}
 - कुल                                                $88.037 बिलियन (६९वां)
 - प्रति व्यक्ति                                    $2,309 (१३७वां)


मानव विकास सूचकांक  (२००७)-        0.531 (मध्यम) (१५० वां)
मुद्रा-                                                  सूडानी पाउंड (SDG)






June 23, 2012

झारखंड का विकास



झारखंड में विकास जोरों पर है. इसका पता झारखंड जाने वाली ट्रेन में ही लग जाता है. अधिकतर जवान..लेकिन तोंद निकली हुई. छोटे बच्चों से बोगी भरी हुई है. कोई ठेकेदारी करता है तो कोई ट्रकों का धंधा. कोई कोयले की दलाली में है तो कोई सूदखोरी में. सच में विकास जोरों पर है.
मोबाइल फोन पर लगातार बजते हुए गाने साबित करते हैं कि रांची के बच्चे भी छम्मक छल्लो और रा वन से आगे निकल कर रिहाना और लेडी गागा तक पहुंच सकते हैं. लेकिन हिंदी की चार पंक्तियां भी सही सही बोल लें वही बहुत है.
सत्यमेव जयते का फैन क्लब यहां भी है. लोग रिकार्ड कर के लैपटॉप पर आमिर से ज्ञान ले रहे हैं. दहेज पर. दहेज में लैपटॉप भी मिलता है ऐसा बिहार झारखंड के लोग कहते हैं. दहेज के लैपटॉप पर आमिर का ज्ञान कितना अच्छा लगता है. बोलने में अच्छा लगता है दहेज नहीं लेना चाहिए लेकिन लेने में बुरा किसी को नहीं लगता. दहेज नहीं वो तो विवाह खर्च होता है. बड़े घर में शादियां ऐसे ही होती है. सच में विकास जोरों पर है.
लैपटॉप पर फिल्में चल रही है. कुछ दिन पहले रिलीज हुई इश्कजादे. कोई फोन पर कह रहा है. हमारा पैसा क्यों नहीं दिए. कल आके ठोक देंगे तो ठीक लगेगा. बढ़ी तोंद वाला यह जवान ठेका पाने की खुशी में दारु-मुर्गा का न्योता भी दे चुका है. मसूरी से लौटता यह दंपत्ति दुखी है कि मसूरी में गर्मी थी और गुस्से में कि मसूरी से आगे कुछ देखने के लिए ही नहीं था. मसूरी में गर्मी की छुट्टियां बेकार हो गई हैं. उन्हें कौन बताए कि मसूरी से आगे देखने के हज़ारों खूबसूरत नज़ारे हैं. लेकिन झारखंड की जनता मसूरी जा रही है तो निश्चित है विकास ज़ोरों पर है.
शहर से गांव कस्बों की दूरी झारखंड में अधिक नहीं है. जमशेदपुर में बस से उतरते ही एक ऑडी, एक बीएमडब्ल्यू देखते ही मैं समझ जाता हूं कि मैं एक ऐसे शहर में हूं जो दिल्ली मुंबई के आगे हो जाना चाहता है. मैं मोटरबाइक पर ही निकलता हूं अपने घर की तरफ. छोटे छोटे गांवों से होते हुए कॉलोनी तक पक्की सड़क है लेकिन सड़क पर कारों की भरमार है. सूमो, बोलेरो और कभी कभी स्कार्पियो को भी साइड देना पड़ रहा है. छोटे वाहनों और पैदल चलने वालों की औकात ही नहीं है. ज़ाहिर है विकास जोरों पर है.


सड़क के दोनों ओर तैनात जंगल अब कट गए हैं. टाटा बढ़ रहा है. कटे जंगलों की जगह विकास के सबसे बड़े मॉडल फ्लैट बन रहे हैं. फ्लैट में रहने का पहला मतलब है आप विकसित हैं. बचपन में हम ऐसे घरों को दड़बा कह कर हंसा करते थे. हमें नहीं पता था कि ये हमारा भविष्य है. भले ही इन फ्लैटों के बनने में जंगल के जंगल तबाह हो जाएं लेकिन यही हमारा विकास है. यही झारखंड की प्रगति है.
फ्लैट कम होते जाते हैं और गांव आने लगते हैं. मैं सूकून पाता हूं हरियाली में लौटते ही. सड़कों के किनारे मिट्टी और पत्थरों को मिला कर बनाए गए आदिवासियों के घर मेरे बचपन की यादों का अहम हिस्सा रहे हैं. इतनी सपाट तो सीमेंट की दीवारें नहीं होती. यदा कदा चारखाने की धोती दिखती है. काली गठीली देह पर यह छोटी धोती फबती खूब है. वैसे शर्ट पैंट पतलून का विकास तो पहले ही हो चुका था. अब लोग जूते भी पहनते हैं. मोजे के साथ. सच में विकास जोरों पर है.
हाड़तोपा के पास तिलका मांझी की एक प्रतिमा मेरे सामने ही लगी होगी. तिलका मांझी चौक बाबा तिलका चौक हो गया है. तिलका मांझी को बाबा तिलका होने में ज्यादा समय नहीं लगा है.. इतने ही कम समय में झारखंड का विकास भी हो गया है.
आगे ही एक मैदान है जहां फुटबॉल के मैच देखने हर रविवार को आया करते थे. मैदान भी है. गोल पोस्ट भी है. खिलाड़ी भी हैं लेकिन फुटबॉल गायब है. क्रिकेट खेला जा रहा है. विकास हो रहा है निश्चित रुप से. फुटबॉल से क्रिकेट तक आना विकास ही कहा जाएगा क्योंकि क्रिकेट तो भद्र लोगों का खेल है. फुटबॉल तो लातिन अमरीका और अफ्रीका के बर्बर देश भी खेलते हैं. मेरा शक सुबहा अब यकीन में बदल गया था कि झारखंड में विकास ज़ोरों पर है.
...........ऐसा नहीं की मैं झारखण्ड की तरक्की नहीं देखना चाहता बल्कि मैं चाहता हूँ  की यहाँ की मूलवासी दुनिया को देखे और झारखण्ड  की राजनीति को समझे की ये नेता जो यहाँ की मूलवासी के हितेषी होने का  दावा तो करती है  पर क्या करती है इसका जवाब यही  है  की पिछले 9 सालों  में यहाँ  9 सरकारें  आई और गई .....मैं चाहता हु की यहाँ के युवा लेडी गागा , रीहाना, और एनरीक का गाना सुनने के साथ साथ उन्हें जाने और साथ में ये भी जाने की दुनिया में क्या हो रहा है..... कई ऐसे लोग भी  होंगे  जो मेरे विचारों से सहमत नहीं होंगे  पर झारखण्ड- जहाँ खनीज की इतनी प्रचुरता है अगर यह  किसी अन्य राज्य में होता तो .............इसका जवाब  हैं।

June 20, 2012

बिहार में रेलवे प्लेटफॉर्म पर पढ़ाई

बिहार के रोहतास जिले के सासाराम स्टेशन के एक लैम्पपोस्ट के नीचे छात्रों के एक गुट को रोज पढ़ाई करते देखा जा सकता है.
रात के समय, आसपास गुजरती ट्रेनों के शोर और यात्रियों की भीड़ से बेखबर वो घेरे में बैठकर अपना काम करते जाते हैं.
23 वर्षीय सरोज कुमार, एक ट्रक ड्राइवर के बेटे हैं. हाल ही में उन्होंने रेलवे और स्कूल टीचर की दो परीक्षाएं पास कीं.
पिछले दो वर्षों से वो यहां ट्रेन पकड़ने या किसी और काम से नहीं बल्कि अपनी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए आते रहे हैं.
अपनी कामयाबी का श्रेय वो सासाराम स्टेशन को देते हैं, लिहाजा उन्होंने रेलवे की नौकरी करने का फैसला किया है.
उनकी तरह ही बिजली से वंचित सैंकड़ों बच्चे, सूरज ढलने के बाद सासाराम स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर मिलकर पढ़ाई करते हैं.
इनमें से ज्यादातर बहुत गरीब तबके के हैं और कोचिंग की सुविधा नहीं ले सकते.

बिहार में बिजली गुल

ये छात्र एक घेरे में बैठते हैं. बीच में एक छात्र परीक्षा की गाइड से सवाल पूछता है तो आसपास वाले जोर-जोर से जवाब देते हैं ताकि सबको सब सुनाई दे.
यहां पढ़नेवाले ज्यादातर छात्र भारतीय रेलवे और बैंकों में नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी करते हैं.
सरोज बताते हैं, “यहां पिछले दस वर्षों से छात्र आ रहे हैं और उनकी कोशिश रहती है कि वो देर तक पढ़ाई करें, हम यहां आते हैं क्योंकि हमारे इलाकों में बिजली कटौती होती रहती है.”
कई अन्य राज्यों की तरह बिहार में बिजली का घोर संकट है. बिहार में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत देश की औसत खपत का करीब 17 प्रतिशत ही है.
यहां आकर पढ़ाई करनेवाले एक छात्र राहुल कुमार कहते हैं, “यहां ज्यादातर वो छात्र होते हैं जो शहर में एक कमरा किराए पर लेकर रह रहे हों लेकिन कई ऐसे भी हैं जो रोज 50-60 किलोमीटर का सफर तय करके आते हैं
              बिहार के रोहतास जिले के सासाराम स्टेशन के एक लैम्पपोस्ट के 
               नीचे छात्रों के एक गुट को रोज पढ़ाई करते देखा जा सकता है.
रात के समय, आसपास गुजरती ट्रेनों के शोर और यात्रियों की भीड़ से बेखबर वो घेरे में बैठकर अपना काम करते जाते हैं.
23 वर्षीय सरोज कुमार, एक ट्रक ड्राइवर के बेटे हैं. हाल ही में उन्होंने रेलवे और स्कूल टीचर की दो परीक्षाएं पास कीं.
पिछले दो वर्षों से वो यहां ट्रेन पकड़ने या किसी और काम से नहीं बल्कि अपनी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए आते रहे हैं.
अपनी कामयाबी का श्रेय वो सासाराम स्टेशन को देते हैं, लिहाजा उन्होंने रेलवे की नौकरी करने का फैसला किया है.
उनकी तरह ही बिजली से वंचित सैंकड़ों बच्चे, सूरज ढलने के बाद सासाराम स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर मिलकर पढ़ाई करते हैं.
इनमें से ज्यादातर बहुत गरीब तबके के हैं और कोचिंग की सुविधा नहीं ले सकते.

बिहार में बिजली गुल

ये छात्र एक घेरे में बैठते हैं. बीच में एक छात्र परीक्षा की गाइड से सवाल पूछता है तो आसपास वाले जोर-जोर से जवाब देते हैं ताकि सबको सब सुनाई दे.
यहां पढ़नेवाले ज्यादातर छात्र भारतीय रेलवे और बैंकों में नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी करते हैं.
सरोज बताते हैं, “यहां पिछले दस वर्षों से छात्र आ रहे हैं और उनकी कोशिश रहती है कि वो देर तक पढ़ाई करें, हम यहां आते हैं क्योंकि हमारे इलाकों में बिजली कटौती होती रहती है.”
कई अन्य राज्यों की तरह बिहार में बिजली का घोर संकट है. बिहार में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत देश की औसत खपत का करीब 17 प्रतिशत ही है.
यहां आकर पढ़ाई करनेवाले एक छात्र राहुल कुमार कहते हैं, “यहां ज्यादातर वो छात्र होते हैं जो शहर में एक कमरा किराए पर लेकर रह रहे हों लेकिन कई ऐसे भी हैं जो रोज 50-60 किलोमीटर का सफर तय करके आते हैं

स्टेशन वाले स्टूडेन्ट्स’

"यहां पिछले दस वर्षों से छात्र आ रहे हैं और उनकी कोशिश रहती है कि वो देर तक पढ़ाई करें, हम यहां आते हैं क्योंकि हमारे इलाकों में बिजली कटौती होती रहती है."

सासाराम के प्लेटफॉर्म पर पढाई करनेवाले ये छात्र ‘स्टेशन वाले स्टूडेन्ट्स’ के नाम से मश्हूर हैं. ये बहुत सुव्यवस्थित तरीके से पढ़ाई करते हैं.
राहुल कुमार बताते हैं, “हम पैसे इकट्ठा कर प्रश्न-पत्रों की प्रतियां बनवा लेते हैं और फिर परीक्षा की ही तरह उन्हें एक तय समयावधि में हल करने की कोशिश करते हैं.”
राहुल के मुताबिक कई बार वो छात्र यहां आकर इनसे अपने अनुभव और जानकारी बांटते हैं, जो इसी प्लेटफॉर्म पर पढ़ाई कर कोई परीक्षा पास कर अब नौकरी कर रहे हैं.
यहां पढ़ाई करनेवाले छात्रों का दावा है कि हर वर्ष करीब 100 ‘स्टेशन वाले स्टूडेन्ट्स’ किसी सरकारी नौकरी की परीक्षा में उतीर्ण हो नौकरी पाते हैं.


December 17, 2011

1971 युद्ध की कुछ दुर्लभ तस्वीरें


वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में दोनों देशों के सैनिकों की बीच जमकर लड़ाई हुई. लेकिन आख़िरकार पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए. इस युद्ध की कुछ दुर्लभ तस्वीरें देखिए



Before surrender Indian Commander Welcomes Pakistani Commander



भारतीय सैनिकों को ढाका की तरफ़ बढ़ने से रोकने के लिए पाकिस्तानी सैनिकों ने हार्डिंज पुल पर अपना ही टैंक ख़राब करके छोड़ दिया.(तस्वीर- भारत-रक्षक डॉट



A Pak Army Patton brewing up smoke after being hit in the Shakargarh sector



Lieutenant General Niazi being escorted by Lieutenant General Aurora and other senior Indian Army officers for the signing of the Instrument of Surrender on 16 December 1971



Jubilant paratroopers from the 2nd Para, entering Dacca - the capital of the newly-founded state of Bangladesh, on 16 December 1971.



Indian jawans atop a captured T-59 tank of the Pakistan Army. The T-59 was a copy of the Russian T-55. This photo was probably taken in the Chamb sector.



Major General M H Ansari (right), Commander of the Pakistan Army's 9th Division is pleasantly relieved as he surrenders to Major General M S Brar (left), Commander of India's 4th Division. The 4th Infantry Division a.k.a. the Red Eagle Division is an infantry division that draws its roots to before Indian independence, having been formed in Egypt in 1939 under the command of then Major General (later Lieutenant General) Sir Noel Beresford-Peirse, KBE, CB, DSO. The Fighting Fourth, as it was also known, was the first Indian formation to go overseas during the Second World War



Pakistan Army Officers lay down their side-arms as a formal act of surrender to the Indian Army in East Pakistan.



Pakistan Army troops set up a charge, to blow a vital bridge in attempt to slow down the Indian Army advance towards Dhaka - the capital of the erstwhile East Pakistan.



Two jawans pose for the camera atop a captured Pakistani Army M-24 Chafee after the Battle of Boyra on 21 November 1971.



















पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ाँ ने जब 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया और शेख़ मुजीब गिरफ़्तार कर लिए गए, वहाँ से शरणार्थियों के भारत आने का सिलसिला शुरू हो गया.
जैसे-जैसे पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की ख़बरें फैलने लगीं, भारत पर दबाव पड़ने लगा कि वह वहाँ पर सैनिक हस्तक्षेप करे.

इंदिरा चाहती थीं कि अप्रैल में हमला हो

इंदिरा गांधी ने इस बारे में थलसेनाअध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय माँगी.
उस समय पूर्वी कमान के स्टाफ़ ऑफ़िसर लेफ़्टिनेंट जनरल जेएफ़आर जैकब याद करते हैं, "जनरल मानेकशॉ ने एक अप्रैल को मुझे फ़ोन कर कहा कि पूर्वी कमान को बांग्लादेश की आज़ादी के लिए तुरंत कार्रवाई करनी है. मैंने उनसे कहा कि ऐसा तुरंत संभव नहीं है क्योंकि हमारे पास सिर्फ़ एक पर्वतीय डिवीजन है जिसके पास पुल बनाने की क्षमता नहीं है. कुछ नदियाँ पाँच पाँच मील चौड़ी हैं. हमारे पास युद्ध के लिए साज़ोसामान भी नहीं है और तुर्रा यह कि मॉनसून शुरू होने वाला है. अगर हम इस समय पूर्वी पाकिस्तान में घुसते हैं तो वहीं फँस कर रह जाएंगे."
मानेकशॉ राजनीतिक दबाव में नहीं झुके और उन्होंने इंदिरा गांधी से साफ़ कहा कि वह पूरी तैयारी के साथ ही लड़ाई में उतरना चाहेंगे.
तीन दिसंबर 1971...इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं. शाम के धुँधलके में ठीक पाँच बजकर चालीस मिनट पर पाकिस्तानी वायुसेना के सैबर जेट्स और स्टार फ़ाइटर्स विमानों ने भारतीय वायु सीमा पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए.
इंदिरा गांधी ने उसी समय दिल्ली लौटने का फ़ैसला किया. दिल्ली में ब्लैक आउट होने के कारण पहले उनके विमान को लखनऊ मोड़ा गया. ग्यारह बजे के आसपास वह दिल्ली पहुँचीं. मंत्रिमंडल की आपात बैठक के बाद लगभग काँपती हुई आवाज़ में अटक-अटक कर उन्होंने देश को संबोधित किया.
पूर्व में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए भारतीय सेनाओं ने जेसोर और खुलना पर कब्ज़ा कर लिया. भारतीय सेना की रणनीति थी महत्वपूर्ण ठिकानों को बाई पास करते हुए आगे बढ़ते रहना.

ढाका पर कब्ज़ा भारतीय सेना का लक्ष्य नहीं

आश्चर्य की बात है कि पूरे युद्ध में मानेकशॉ खुलना और चटगाँव पर ही कब्ज़ा करने पर ज़ोर देते रहे और ढ़ाका पर कब्ज़ा करने का लक्ष्य भारतीय सेना के सामने रखा ही नहीं गया.
इसकी पुष्टि करते हुए जनरल जैकब कहते हैं, "वास्तव में 13 दिसंबर को जब हमारे सैनिक ढाका के बाहर थे, हमारे पास कमान मुख्यालय पर संदेश आया कि अमुक-अमुक समय तक पहले वह उन सभी नगरों पर कब्ज़ा करे जिन्हें वह बाईपास कर आए थे. अभी भी ढाका का कोई ज़िक्र नहीं था. यह आदेश हमें उस समय मिला जब हमें ढाका की इमारतें साफ़ नज़र आ रही थीं."


पूरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को कभी विचलित नहीं देखा गया. वह पौ फटने तक काम करतीं और जब दूसरे दिन दफ़्तर पहुँचतीं, तो कह नहीं सकता था कि वह सिर्फ़ दो घंटे की नींद लेकर आ रही हैं.
जाने-माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा याद करते हैं, "आधी रात के समय जब रेडियो पर उन्होंने देश को संबोधित किया था तो उस समय उनकी आवाज़ में तनाव था और ऐसा लगा कि वह थोड़ी सी परेशान सी हैं. लेकिन उसके अगले रोज़ जब मैं उनसे मिलने गया तो ऐसा लगा कि उन्हें दुनिया में कोई फ़िक्र है ही नहीं. जब मैंने जंग के बारे में पूछा तो बोलीं अच्छी चल रही है. लेकिन यह देखो मैं नार्थ ईस्ट से यह बेड कवर लाई हूँ जिसे मैंने अपने सिटिंग रूम की सेटी पर बिछाया है. कैसा लग रहा है? मैंने कहा बहुत ही ख़ूबसूरत है. ऐसा लगा कि उनके दिमाग़ में कोई चिंता है ही नहीं."

गवर्नमेंट हाउस पर बमबारी

14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के चोटी के अधिकारी भाग लेने वाले हैं.
भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं. बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी. गवर्नर मलिक ने एयर रेड शेल्टर में शरण ली और नमाज़ पढ़ने लगे. वहीं पर काँपते हाथों से उन्होंने अपना इस्तीफ़ा लिखा.
दो दिन बाद ढाका के बाहर मीरपुर ब्रिज पर मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने अपनी जोंगा के बोनेट पर अपने स्टाफ़ ऑफ़िसर के नोट पैड पर पूर्वी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल नियाज़ी के लिए एक नोट लिखा- प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूँ. खेल ख़त्म हो चुका है. मैं सलाह देता हूँ कि तुम मुझे अपने आप को सौंप दो और मैं तुम्हारा ख़्याल रखूँगा.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा अब इस दुनिया में नहीं हैं. कुछ वर्ष पहले उन्होंने बीबीसी को बताया था, "जब यह संदेश लेकर मेरे एडीसी कैप्टेन हरतोश मेहता नियाज़ी के पास गए तो उन्होंने उनके साथ जनरल जमशेद को भेजा, जो ढाका गैरिसन के जीओसी थे. मैंने जनरल जमशेद की गाड़ी में बैठ कर उनका झंडा उतारा और 2-माउंटेन डिव का झंडा लगा दिया. जब मैं नियाज़ी के पास पहुँचा तो उन्होंने बहुत तपाक से मुझे रिसीव किया."
16 दिसंबर की सुबह सवा नौ बजे जनरल जैकब को मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुँचें. नियाज़ी ने जैकब को रिसीव करने के लिए एक कार ढाका हवाई अड्डे पर भेजी हुई थी.
जैकब कार से छोड़ी दूर ही आगे बढ़े थे कि मुक्ति बाहिनी के लोगों ने उन पर फ़ायरिंग शुरू कर दी. जैकब दोनों हाथ ऊपर उठा कर कार से नीचे कूदे और उन्हें बताया कि वह भारतीय सेना से हैं. बाहिनी के लोगों ने उन्हें आगे जाने दिया.

आँसू और चुटकुले

जब जैकब पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पहुँचें. तो उन्होंने देखा जनरल नागरा नियाज़ी के गले में बाँहें डाले हुए एक सोफ़े पर बैठे हुए हैं और पंजाबी में उन्हें चुटकुले सुना रहे हैं.
जैकब ने नियाज़ी को आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़ कर सुनाई. नियाज़ी की आँखों से आँसू बह निकले. उन्होंने कहा, "कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूँ."
जनरल राव फ़रमान अली ने इस बात पर ऐतराज़ किया कि पाकिस्तानी सेनाएं भारत और बांग्लादेश की संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण करें.
समय बीतता जा रहा था. जैकब नियाज़ी को कोने में ले गए. उन्होंने उनसे कहा कि अगर उन्होंने हथियार नहीं डाले तो वह उनके परिवारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते. लेकिन अगर वह समर्पण कर देते हैं, तो उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी होगी.
जैकब ने कहा- मैं आपको फ़ैसला लेने के लिए तीस मिनट का समय देता हूँ. अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूँगा.
अंदर ही अंदर जैकब की हालत ख़राब हो रही थी. नियाज़ी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे जबकि भारत के पास सिर्फ़ 3000 सैनिक और वह भी ढाका से तीस किलोमीटर दूर !
अरोड़ा अपने दलबदल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द ख़त्म होने वाला था. जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था.
30 मिनट बाद जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहाँ सन्नाटा छाया हुआ था. आत्म समर्पण का दस्तावेज़ मेज़ पर रखा हुआ था.
जैकब ने नियाज़ी से पूछा क्या वह समर्पण स्वीकार करते हैं? नियाज़ी ने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने यह सवाल तीन बार दोहराया. नियाज़ी फिर भी चुप रहे. जैकब ने दस्तावेज़ को उठाया और हवा में हिला कर कहा, ‘आई टेक इट एज़ एक्सेप्टेड.’
नियाज़ी फिर रोने लगे. जैकब नियाज़ी को फिर कोने में ले गए और उन्हें बताया कि समर्पण रेस कोर्स मैदान में होगा. नियाज़ी ने इसका सख़्त विरोध किया. इस बात पर भी असमंजस था कि नियाज़ी समर्पण किस चीज़ का करेंगे.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने बताया था, "जैकब मुझसे कहने लगे कि इसको मनाओ कि यह कुछ तो सरेंडर करें. तो फिर मैंने नियाज़ी को एक साइड में ले जा कर कहा कि अब्दुल्ला तुम एक तलवार सरेंडर करो, तो वह कहने लगे पाकिस्तानी सेना में तलवार रखने का रिवाज नहीं है. तो फिर मैंने कहा कि तुम सरेंडर क्या करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है. लगता है तुम्हारी पेटी उतारनी पड़ेगी... या टोपी उतारनी पड़ेगी, जो ठीक नहीं लगेगा. फिर मैंने ही सलाह दी कि तुम एक पिस्टल लगाओ ओर पिस्टल उतार कर सरेंडर कर देना."

सरेंडर लंच

इसके बाद सब लोग खाने के लिए मेस की तरफ़ बढ़े. ऑब्ज़र्वर अख़बार के गाविन यंग बाहर खड़े हुए थे. उन्होंने जैकब से अनुरोध किया क्या वह भी खाना खा सकते हैं. जैकब ने उन्हें अंदर बुला लिया.
वहाँ पर करीने से टेबुल लगी हुई थी... काँटे और छुरी और पूरे ताम-झाम के साथ. जैकब का कुछ भी खाने का मन नहीं हुआ. वह मेज़ के एक कोने में अपने एडीसी के साथ खड़े हो गए. बाद में गाविन ने अपने अख़बार ऑब्ज़र्वर के लिए दो पन्ने का लेख लिखा ’सरेंडर लंच.’
चार बजे नियाज़ी और जैकब जनरल अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुँचे. रास्ते में जैकब को दो भारतीय पैराट्रूपर दिखाई दिए. उन्होंने कार रोक कर उन्हें अपने पीछे आने के लिए कहा.
जैतूनी हरे रंग की मेजर जनरल की वर्दी पहने हुए एक व्यक्ति उनका तरफ़ बढ़ा. जैकब समझ गए कि वह मुक्ति बाहिनी के टाइगर सिद्दीकी हैं. उन्हें कुछ ख़तरे की बू आई. उन्होंने वहाँ मौजूद पेराट्रूपर्स से कहा कि वह नियाज़ी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ़ अपनी राइफ़लें तान दें.
जैकब ने विनम्रता पूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं. टाइगर टस से मस नहीं हुए. जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया. टाइगर ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया. जैकब ने तब चिल्ला कर कहा कि वह फ़ौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं. इस बार जैकब की डाँट का असर हुआ.


साढ़े चार बजे अरोड़ा अपने दल बल के साथ पाँच एम क्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे. रेसकोर्स मैदान पर पहले अरोड़ा ने गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण किया.
अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया. नियाज़ी की आँखें एक बार फिर नम हो आईं.
अँधेरा हो रहा था. वहाँ पर मौजूद भीड़ चिल्लाने लगी. वह लोग नियाज़ी के ख़ून के प्यासे हो रहे थे. भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी के चारों तरफ़ घेरा बना दिया और उनको एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह ले गए.

ढाका स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है

ठीक उसी समय इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ़्तर में स्वीडिश टेलीविज़न को एक इंटरव्यू दे रही थीं. तभी उनकी मेज़ पर रखा लाल टेलीफ़ोन बजा. रिसीवर पर उन्होंने सिर्फ़ चार शब्द कहे....यस...यस और थैंक यू. दूसरे छोर पर जनरल मानेक शॉ थे जो उन्हें बांग्लादेश में जीत की ख़बर दे रहे थे.
श्रीमती गांधी ने टेलीविज़न प्रोड्यूसर से माफ़ी माँगी और तेज़ क़दमों से लोक सभा की तरफ़ बढ़ीं. अभूतपूर्व शोर शराबे के बीच उन्होंने ऐलान किया- ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है. बाक़ी का उनका वक्तव्य तालियों की गड़गड़ाहट और नारेबाज़ी में डूब कर रह गया.